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स्वतंत्रता प्रत्येक प्राणी का जन्म सिद्ध अधिकार है. लेकिन बलशाली प्राणी वलहीन को अपने अनुसार चलाना चाहता है, उसे बन्दी बनाकर गुलाम बनाना चाहता है.. वैज्ञानिक संत आचार्य श्री निर्भय सागर जी महाराज..

स्वतंत्रता प्रत्येक प्राणी का जन्म सिद्ध अधिकार
दमोह। स्वतंत्रता प्रत्येक प्राणी का जन्म सिद्ध अधिकार है। लेकिन बलशाली प्राणी वलहीन को अपने अनुसार चलाना चाहता है उसे बन्दी बनाकर गुलाम बनाना चाहता है। प्रभुत्व और स्वामित्व का भूखा सवसे ज्यादा मानव प्राणी होता है। इस लिये वह सब पर अधिकार जमाना चाहता है यही दशा हमारे देश मे कई बार हुई। अंग्रेजों ने आकर हम देशवासियों को गुलाम बनाया। बन्दी बनाकर यातनाएं दी। लोगो को पराबलंबी जीवन जीना पड़ा। लेकिन हमारे देश के युवाओं ने पुनः स्वावलंबी जीवन जीने के लिए स्वतंत्रता दिलाई। उक्त बात वैज्ञानिक संत आचार्य श्री निर्भय सागर जी ने स्वतंत्रता दिवस के पूर्व बेला में जैन धर्मशाला दमोह में कही।
 आचार्य श्री ने कहा देह की गुलामी देश को गुलाम बनाती है विषय वासना, धन दौलत और इंद्रियों की इच्छा पूर्ति से देह की गुलामी आती है। देह की गुलामी से आत्मा भी गुलाम हो जाती है और चैरासी लाख योनियो के दुःखो को भोगना पड़ता है। विदेशी खान पान और सोच विचार शारीरिक मानसिक गुलामी को दर्शाते है। विदेशी वस्त्र, आभूषण, एवं श्रंगार शारीरिक गुलामी को दर्शाता है। अपनी राष्ट्रीय  भाषा हिंदी को छोड़कर अंग्रेजी में पढ़ना , पढ़ाना और बोलना हमारी वाचनिक गुलामी को दर्शाता है। आचार्य श्री ने कहा ’सत्य मेव जयते’ और ’देश भक्ति जन सेवा’ के इन नारो के साथ हमे ’जियो और जीने दो’ का नारा लगाना होगा। सभी प्राणी को जीने का अधिकार है। प्राणी को कष्ट नही पहुँचना या नही मारना अहिंसा धर्म है।  अहिंसा परम धर्म है, अहिंसा किसी देश की सम्प्रदाय की नही है। वह प्राणी मात्र के लिए है। इस लिए ’अहिंसा परमो धमर्रू’ यह राष्द्रीय नारा होना चाहिये। जो स्वयं जीना चाहता है, वह दूसरों को भी जीने दे यही मानवता है। 
आचार्य श्री ने कहा देह की गुलामी को छोड़ने से आत्मा स्वतंत्र हो जाती है और मोक्ष में जाकर अनन्त सुख भोगती है। देह की गुलामी के कारण हिंसा, झूठ, चोरी, बलात्कार और परिग्रह का संग्रह रूप पाप होता है इसलिये देह की गुलामी सव अपराधों की जड़ है देह की गुलामी सभी पापों में व्यसनों में लिप्त करती है इसलिये भगवान महावीर स्वामी ने देह की गुलामी से मुक्त होने और आत्मा को स्वतंत्र करने का उपदेश दिया। आज के युवा धन के, तन के, पत्नी के, और इंद्रियों के गुलाम बने हुये है। हमारे देश के प्रत्येक व्यक्ति पर लगभग 70 हजार रुपये का कर्ज है। जब देश कर्ज से और आतंकवाद से मुक्त होगा। तभी सच्ची स्वतंत्रता कहलायेगी। यदि शराब पीने वाले शराब छोड़ दे और सरकार शराब से हुई आमदनी का लोभ छोड़ दे तो देश पांच साल में कर्ज मुक्त हो जायेगा। यदि एक व्यक्ति एक दिन में पचास रुपया की शराब पीता है यदि वह उसका त्याग कर दे तो 90 हजार रुपये के पांच साल में वचत होती है, यदि व्याज मिला दिया जाये तो लाखों रुपये हो जाते है। शराब की इनकम से देश चलाना अन्याय है और देश को पुनः परतंत्र होने में कारण है। 

आचर्य श्री ने कहा जिस देश का शिक्षक लोभी हो जाये, सैनिक आलसी, पुलिस अन्यायी, युवा व्यसनी, और नेता स्वार्थी हो जाये तो उस देश का पतन निश्चित है। स्वतंत्रता कायम बनाने रखने के लिये राजनीति की नही, लोकनीति की जरूरत है। जिससे जनता का हित हो, समानता का अधिकार हो, समानता का नियम कानून हो वही लोकनीति है। देश की अखंडता और स्वतंत्रता कायम रखने के लिये कड़क दंड सहिता, सदाचरण, सयंम, स्वाभिमान, और उच्च शिक्षा की परम आवश्यकता है। कल स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में आचार्य श्री निर्भय सागर जी ससघ सानिध्य में फैराया जाएगा राष्द्रीय तिरंगा झंडा और इस अवसर पर 8ः45 बजे आचार्य श्री निर्भय सागर जी महाराज का होगा राष्ट्र के नाम पर संदेश

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