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सेवा करने से तीर्थकर पद सहित अरिहंत भगवान बनते है.. सेवा न करने से दाम्पत्य जीवन सम्यक ज्ञान, दर्शन, चारित्र आदि नष्ट हो जाते है.. वैज्ञानिक संत आचार्यश्री निर्भय सागर जी महाराज..

   अब गुणी साधु वंदनीय नही बल्कि दण्डनीय है..
दमोह। वैज्ञानिक संत आचार्य श्री निर्भय सागर जी ने जैन धर्मशाला दमोह में कहा अब गुणी साधु वंदनीय नही बल्कि दण्डनीय है, दंड देने से खोटे कर्म निकल जाते है। गुणों की प्राप्ति के लिये गुणीजनों के वन्दना की जाती है, गुणी साधु वंदनीय है। गुणी जनों को देखकर विनय, सेवा और प्रशंशा के भाव उमड़ना चाहिये, गुणी की सेवा करने से गुणों की प्राप्ति होती है, सेवा से मेवा मिलता है, अर्थात् इष्ट वस्तु की प्राप्ति होती है। गुणीजनों के जीवन मे आई हुई आपत्ति, विपत्ति, दर्द, बीमारी को गुणानुराग पूर्वक दूर करना सच्ची सेवा है, सेवा एक तप है, जैनधर्म में सेवा करने को वैयावृति तप कहा है वृद्धों की सेवा करना भगवान की पूजा के समान हैं। 
आचार्य श्री ने कहा बच्चा बुढ़ा एक समान होता है, बच्चों की तरह वृद्धो की सेवा प्रती पूर्वक गिलानी से रहित होकर करना चाहिये। बड़े वुजर्गो को और साधु संतों को बैठने का आसन दे देना, आहार के साथ औषधि दे देना , चार हितिकारी बाते सुनाकर विकल्पों को दूर कर देना, संस्तर साफ कर देना ही सच्ची सेवा है मात्र हाथ पैर दबाने का नाम सेवा नही है,वृद्धो को देखकर व्यंग कसना अपने जीवन का नाश करने के लिये  बम्ब फोड़ने जैसे है। जो साधु संतों की और वृद्धजनो की सेवा नही करता है वह स्वयं रोगी बनता है।  जीवन को पतन की मार्ग पर ले जाता है

 सेवा करने से तीर्थकर पद सहित अरिहंत भगवान बनते है, आचार्य मुनियों को उपदेश देकर मुक्ति मार्ग पर बढ़ाते है और श्रावक को उपदेश देकर कर्तव्य निष्ठ का बोध कराते है सेवा न करने से दाम्पत्य जीवन सम्यकज्ञान, सम्यकदर्शन, सम्यक चारित्र आदि नष्ट हो जाते है, सेवा करने से अनेक गुण प्रकट होते है जैसे श्रद्धा,भक्ति, वात्सल्य,दान,विनय,समर्पण आदि गुण प्रकट होते है, वृद्ध साधु की सेवा करने से चारो धाम की तीर्थ यात्रा करने का फल मिलता हैं। साधु स्वयं चेतन्य तीर्थ है,जो स्वयं तरता है और दूसरो को तारता है। आचार्य श्री ने कहा जो विषय कषाय के रसा तल से ऊपर उठकर आत्मा के धरातल तक आ जाता है वह एक दिन परमात्मा की ऊंचाइयों को छू लेता है।

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