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साधू ,समाज और परिवार की सेवा परम् धर्म है.. सेवा वही कर सकता है जिसके अंदर विनय और श्रद्धा हो.. भगवान की पूजा करना है भगवान की सेवा है.. वैज्ञानिक संत आचार्य श्री निर्भय सागर जी महाराज..

भगवान की पूजा करना ही भगवान की सेवा है..
दमोह। आचार्य श्री निर्भय सागर जी ने कहा साधू ,समाज और परिवार की सेवा परम् धर्म है। सेवा वही कर सकता है जिसके अंदर विनय और श्रद्धा हो। भगवान की पूजा कर ना ही भगवान की सेवा है, गुरु के लिये समय पर श्रद्धा भक्ति सहित आहार देना और शारीरिक कष्ट आने पर उस को दूर कर देना, गुरु की सेवा है। वर्तमान में माता पिता के प्रति सन्तान का सेवा करने का भाव घटता जा रहा है, जब से एक बेटा-बेटी का चलन हुआ है, तव से माता -पिता ही सन्तान की सेवा में लगे है पहले जब ४-६ सन्तान होती थी तब सन्तान माता - पिता की सेवा करती थी। 
 आचार्य श्री ने कहा जैन धर्मानुसार ० और १ से लेकर ९ तक अंक कहलाते है लेकिन सँख्या २ से लेकर नन्त तक होती है जैन धर्म मे  ० और १ को सँख्या नही माना है। क्योंकि जैसे किसी कमरे में आप स्वंय एक व्यक्ति है और कमरा बन्द है और बाहर किसी व्यक्ति ने आपसे पूछा कि कमरे में कौन है तो आप कहगे कोई नहीं जब दूसरा कोई व्यक्ति होता तब आप कहते कि हा कोई दूसरा व्यक्ति है। इससे स्पष्ट होता है सँख्या २ से प्रारम्भ होती है। आचार्य श्री ने कहा समाज, परिवार और साधु सघ को तोड़ने का काम नही करना चाहिये बल्कि जोड़ने का काम करना चाहिये। कानाफूसि, चुग़ली करने से आरोप प्रत्यारोप लगा ने से एवं लड़ाई झगड़ा करने से परिवार, समाज टूटता है जो तोड़ने का काम करता है वह गुनाहगार है। दिलो में नफरत पैदा करने से भी लोग टूट जाते है जुड़ते नहीं। 

 आचार्य श्री ने कहा कि नफरत से बढ़कर कोई बम्ब नही होता जितनी हिंसा और युद्ध नफरत से हुये उतने किसी से नहीं। सन्तान की शोभा माता-पिता से है और माता-पिता की शोभा सन्तान से है। गुरु की कीमत शिष्य से है और शिष्य की कीमत गुरु से है। राजा की शक्ति प्रजा से है और प्रजा की शक्ति बुद्धिमान परोपकारी राजा से है। एक दूसरे का सम्बंध मधुर होना चाहिये। कटु सम्बन्ध विनाश का कारण होता है। जैसे पतंग डोर से बंधी रहे और डोर उड़ाने वाले के हाथ मे रहे तो पतंग सबको आंनद देती है और सुरक्षित रहती है लेकिन जब सम्बन्ध टूट जाता है तो पतंग की कोई कीमत नही रहे जाती है वह स्वयं मिट जाती है। वैसे ही जब तक गुरु शिष्य का, बाप बेटे का और राजा का प्रजा से जब तक सम्बंध बना रहता है तब तक आनन्द सुख शांति और सुरक्षा बनी रहती है।


आचार्य श्री ने कहा कि लोकतंत्र में प्रत्येक नागरिक राजा बनने की हेसियत रखता है हमारे लोकतांत्रिक देश में धर्मवनिरपेक्षता का सिद्धांत चल रहा है, धर्म निरपेक्षता का अर्थ धर्म कार्य करने में पूर्ण स्वतंत्रता। यदि कोई अपने धर्म के अनुसार पूजा - पाठ और मन्दिर निर्माण आदि करता है और वही  उसी धर्म का अनुयायी है ऐसा व्यक्ति यदि अपने मन्दिर का शिलान्यास करे और पूजा-पाठ करके राजनीति करे और देश चलाये तो इसका मतलब धर्म निरपेक्ष की हत्या नही है इस लिए यदि हमारे देश के प्रधानमंत्री ने राम मंदिर का शिलान्यास अयोध्या में कर दिया तो लोकतंत्र या धर्म निरपेक्षता की हत्या नही है। हत्या तब मानी जाती जब दूसरे धर्म को वे मिटाने की बात करते जबकि उन्होंने ऐसा कुछ कहा न किया है बल्कि न्यायपालिका द्वारा दिए गए निर्णय के अनुसार कार्य किया है।

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