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हमारे देश मे जन शक्ति,धन शक्ति, ज्ञान शक्ति, यंत्र शक्ति, सन्त शक्ति और मन्त्र शक्ति काम करती है.. इन शक्तिओ से देश चल रहा है.. वैज्ञानिक संत आचार्य श्री निर्भय सागर के सानिध्य में स्वतंत्रता दिवस..

आचार्य श्री निर्भय सागर जी के सानिध्य में राष्ट्रीय ध्वजा रोहण कर मनाया स्वतंत्रता दिवस..
दमोह। परम पूज्य वैज्ञानिक संत आचर्य श्री निर्भय सागर जी महाराज का 34 वा चातुर्मास जैन धर्मशाला दमोह में चल रहा है। 14 वर्ष पूर्व ऐलक अवस्था मे भी आपका चातुर्मास हुआ था। इस वर्ष आचार्य श्री के सघ सानिध्य में राष्द्रीय पर्व मनाया गया। सर्व प्रथम राष्ट्रीय ध्वज को नरेन्द्र कुमार जी खजरी वाले, नेमी चन्द्र बजाज, राजू नायक, चक्रेश सर्राफ,राजेश हिनोती, अनिल फोटो ने ध्वजा फैराई। तद उपरान्त देश मे शान्ति हेतु विशेष मन्त्रो का उच्चारण करते हुये भगवान महावीर स्वामी की प्रतिमा पर अखण्ड जल की धारा करते हुये शान्तिधारा की गयी जिसका सौभाग्य आंनद कुमार जी स्मिता जैन, चन्द्रकुमार सिदार्थ शक्ति भंडार, चक्रेश सरार्फ, नरेन्द्र खजरी को प्राप्त हुआ।
इस अवसर पर आचार्य श्री निर्भय सागर जी महाराज ने देश के नाम सन्देश देते हुये कहा स्वतंत्रता को स्वछंदता में नही बदलना चाहिये। आचरण हीन व्यक्ति स्वछंद हो जाता है। व्यसनों में लिप्त होने स्वछंदता जा प्रतीक है। भूचण खाने, मुर्गी पालन,मछली पालन,उद्योग खोलने,अंग प्रर्दशन करने, सट्टा जुआ खेलने और मध्यपान करने के लिये स्वतंत्रता नही मिली। बल्कि स्वावलम्बी जीवन जीने आत्मानुशासित रहने और देश का विकास करने के लिये स्वतंत्रता मिली है। आचार्य श्री ने कहा हमारे देश मे जनशक्ति,धन शक्ति, ज्ञान शक्ति, यंत्र शक्ति, सन्त शक्ति और मन्त्र शक्ति  काम करती है इन शक्तिओ से देश चल रहा है। जन शक्ति बढ़ाने के लिये भाई चारा अपनाना चाहिये। परिवार में विघटन नही सगठन होना चाहिये, भाई चारा सगठन तभी सम्भव है जब भाई का भाई हुआ, जिसका भाई ही नही होगा वह भाई चारे की शिक्षा प्राप्त नही कर सकता। भाई चारे की शिक्षा से रहित बच्चे आतंकी, अज्ञानी, हिंशक और नफरत फैलाने वाले होते है। सन्त शक्ति और मन्त्र शक्ति ये दो शक्ति हमारे देश की अध्यातम शक्तियां है, जब जब राजा के ऊपर आपत्ति आती है, बुद्धि का भ्रम होता है तब तक महाराजा (संत ) उसे मार्ग दर्शन देते है। 
इस अवसर पर मुनि श्री शिवदत्त सागर जी ने कहा ध्वजा हमारे देश की शान और पहिचान है। ध्वजा का अपमान नही समान करना चाहिये। ध्वजा की रक्षा के लिये वीरो ने बलिदान दिया है, मुनि हेमदत्त सागर जी ने कहा परतंत्रता दुःखदायी होती है, पराधीनता ही परतंत्रता ही कहलाती है , पराधीनता में सुख नही है दुख ही दुख है इस लिए कोई पराधीनता नही रहना चाहता, मुनि सुदत्त सागर जी ने कहा श्रद्वा ,समर्पण और पुरूषार्थ से हम आजाद हुये है। इस आजादी को बनाये रखने के लिये हमे साथ रहना होगा, मुनि सोमदत्त सागर जी ने कहा सम्यकदर्शन, सम्यकज्ञान, सम्यकचारित्र से घ्म अपनी आत्मा को इस देह से स्वतंत्र करा सकते है, मुनि गुरुदत्त सागर जी ने कहा हमे विदेशी नही स्वदेशी खान-पान रहन-सहन अपनाना होगा, क्षुल्लक श्चन्द्रदत्त सागर जी ने कहा हमे अपनी आत्मा को देह से उक्त करा कर स्वात्मा में आना होगा।

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