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दान पूजा के समय व्यक्ति के अंदर किसी प्रकार की विषय वासनाओं की इच्छा नहीं रहती है.. गुरु की डांट फटकार अभिशाप नहीं वरदान है- आचार्य निर्भय सागर.. कुण्डलपुर में 48 मंडली भक्तांबर विधान संपन्न..

लोकतांत्रिक देश में सब को लेकर चलने का सिद्धांत प्रवाह मान होता है..

दमोह। वैज्ञानिक संत आचार्य श्री निर्भय सागर जी महाराज ने प्रातः कालीन धर्म सभा में कहा देश में जातीय और सांप्रदायिक सौहार्द के लिए अनेकांत और स्यादवाद के सिद्धांत को अपनाने एवं अहिंसा के मार्ग पर चलने की जरूरत है। एकांतवाद सिर्फ अपनी बात करता है। अनेकांत वाद सब की बात करता है और सब को लेकर चलता है। लोकतांत्रिक देश में सब को लेकर चलने का सिद्धांत प्रवाह मान होता है। अतः अनेकांतवाद लोकतांत्रिक सिद्धांत है। स्यादवाद कथन करने की पद्धति है, कहने का ढंग है और तरीका है। वैसे हमारे देश में वसुदेव कुटुंबकम का सिद्धांत चलता है। इसलिए हम भारतवासी इंसानों से क्या पशुओं से भी सौहार्द की बात करते हैं और सौहार्द से रहते हैं। सौहार्द तो उन्हें अपनाना चाहिए जो कट्टरपंथी है, दूसरों के धर्म को मिटाना चाहते हैं, दूसरों के धर्म एवं जाति से नफरत करते हैं, धर्म के नाम पर हिंसा आतंक और नफरत फैलाते है। ऐसे लोग ही देश में जाति और सांप्रदायिक सौहार्द की बात ज्यादा उछालते हैं। भारतीय संस्कृति वालों ने हमेशा सबको गले लगाया है, लेकिन यहां के लोगों ने जिन को गले लगाया है उन्होंने ही इस संस्कृति को मिटाया है। इतिहास इसका गवाह है। 

आचार्य श्री ने कहा अपने आराध्य देवता का आलंबन  लेकर मन के बुरे विचारों को और आत्मा में लगे पाप कर्म रूपी मेल को हटाकर मन और आत्मा को पवित्र करना ही पूजा है। साधु का स्वभाव और भगवान की पूजा सूप के स्वभाव जैसा होना चाहिए, जो सार सार को ग्रहण करें और सारहीन थोता को उड़ा दे। गुरु की डांट और फटकार दोनों जरूरी है डांट से अंदर आत्मा में चिपके हुए मज्जा के समान दुष्कर्म आत्मा से पृथक हो जाते और फटकार से उड़ जाते हैं इसलिए, गुरु की डांट फटकार अभिशाप नहीं वरदान है । दान और पूजा महान तप है। इच्छाओं के निरोध करने का नाम तप है। दान पूजा के समय व्यक्ति के अंदर किसी प्रकार की विषय वासनाओं की इच्छा नहीं रहती है। उस समय भक्ति और त्याग की भावना होती है इसलिए दान पूजा महान तपस्या है। आचार्य श्री ने कहा गैस पर भोजन तो पकाना चाहिए और तवा रखकर रोटी भी सेकना चाहिए, लेकिन डायरेक्ट बर्नर पर रोटी रखकर फुलाना नहीं चाहिए, क्योंकि बर्नर पर रोटी रखकर सेकने से बिना जली हुई गैस भर जाती है, ऐसी रोटी खाने से सिर दर्द और एसिडिटी हो सकती है। अतः रोटी को अंगार पर ही फुलाना चाहिए। 

आचार्य श्री ने पूजा के पहले दान को रखने का कारण बताते हुए कहा दान की क्रिया में पूजा गर्वित हो जाती है लेकिन पूजा में दान गर्भित नहीं होता और पूजा से महत्वपूर्ण दान है इसलिए दान को पहले रखा गया है। मनुष्य के लिए धन और अन्न ये दो सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण प्राण है। नारी प्रातः काल उठते ही अन्न की चिंता करती है पुरुष धन की चिंता करता है इसलिए नारी प्रातः अन्न पकाती है और पुरुष धन कमाता है इसी से जीवन चलता है।

कुण्डलपुर में सानंद संपन्न हुआ विधान..
दमोह। कुंडलपुर में आर्यिका रत्न ऋजु मति माताजी, आर्यिका रत्न पूर्णमति माताजी एवं आर्यिका रत्न उपशांतमति माता जी के एवं संजीव भैया कटंगी के कुशल निर्देशन में कोरोना बीमारी की मुक्ति के लिए 48 मंडली भक्तांबर विधान का सानंद समापन हो हुआ। कुंडलपुर क्षेत्र कमेटी के प्रचार मंत्री सुनील वेजीटेरियन ने बताया कि कोरोना वायरस की मुक्ति के उद्देश्य को लेकर किए गए इस ऑनलाइन विधान में पूरे देश एवं विदेश से भी श्रावक गणों ने बहुत उत्साह पूर्वक सहभागिता की।
कुंडलपुर में दिनांक 4 अक्टूबर से 12 अक्टूबर तक चले इस विधान में श्रावक श्राविका ने घर पर ही बैठ कर ऑनलाइन पूर्णाहुति समर्पित करते हुए अपने धार्मिक उत्साह को प्रकट किया अंतिम दिन विश्व शांति महायज्ञ के साथ पूर्णाहुति समर्पित की गई। इस अवसर पर आर्यिका रत्न पूर्णमति माताजी ने अपने मंगल उद्बोधन में कहा की सद्गुरु हमारे लिए प्रेरणा के स्रोत बन जाते हैं मनुष्य तभी महान बनता है जब वह सद्गुरु के बताए मार्ग पर चलते हुए अपने समय का उपयोग करता है किंतु इंसान सफल होना तो चाहता है लेकिन वह सफल लोगों से ईर्ष्या करता है इंसान गुणों को तो चाहता है किंतु गुणों को ग्रहण नहीं करना चाहता वह संसार में ही भटकता रहता है जिसे जिनेंद्र भगवान की महिमा का भान हो जाता है वह अपने आप महान हो जाता है जब गुरु अंदर से आशीर्वाद देते हैं तो कर्मों की कड़ियां अपने आप टूटने लगते हैं और मोक्ष मार्ग प्रशस्त होने लगता है।

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