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ज्ञानदान, अभय दान, करुणा दान, औषधी दान, उपकरण दान आदि सभी दानों में आहार दान सर्वश्रेष्ठ दान है.. आहार दान देने वाला सबसे बड़ा उपकारी है.. वैज्ञानिक संत आचार्य श्री निर्भय सागर जी महाराज

 आहार दान सर्वश्रेष्ठ दान है- आचार्य निर्भय सागर’ 

दमोह। वैज्ञानिक संत आचार्य श्री निर्भय सागर जी महाराज ने कहा दान और पूजा मानव जीवन के दो मुख्य कर्तव्य है । दान से इस लोक और परलोक दोनों में भोग उपभोग की सामग्री  एवं सुख  प्राप्त होता है । दान के बिना मानव जीवन व्यर्थ है । उदार वृत्ति वाला आदमी अपना पेट भरने के साथ दूसरों के पेट भरने की भी चिंता करता है ,लेकिन कृपण, कंजूस ,लोभी ,लालची आदमी सिर्फ अपने पेट भरने की चिंता करता है । वह जोड़ जोड़ कर रख लेता है ना खाता है और ना खिलाता  है । इस प्रसंग पर आचार्य श्री ने कहा ’दातारों को मजा इसी में खाने और खिलाने में ,’’कंजूसों को मजा इसी में जोड़ जोड़ मर जाने में’

आचार्य श्री ने कहा ज्ञानदान, अभय दान, करुणा दान, औषधी दान, उपकरण दान आदि सभी दानों में आहार दान सर्वश्रेष्ठ दान है । आहार दान देने से सभी प्रकार के दान हो जाते हैं । प्रत्येक प्राणी को कुछ मिले या ना मिले पर पेट भर भोजन किसी के द्वारा मिल जाए तो वह उसके उपकार को जिंदगी भर नहीं भूलता.। आहार दान देने वाला सबसे बड़ा उपकारी है। कोरोना के समय लॉकडाउन में जिन्होंने गरीब असहाय भूखे लोगों को आहार कराया है उन्होंने अपने मानव जीवन और धन को सार्थक किया है। प्रवचन के उपरांत  आचार्य संघ की आहार चर्या हुई  आहार चर्या के उपरांत  समस्त मुनियों के बीच  एक  वार्ता का से ज्ञात हुआ कि दिगंबर जैन मुनि 24 घंटे में एक ही बार अन्न, जल, दूध ,फल आदि शुद्ध शाकाहारी आहार ग्रहण करते हैं । 

आचार्य श्री निर्भय सागर जी महाराज ने कहा आहार करने का समय प्रातः 8 बजे से 12 बजे तक निश्चित है ।  इसी बीच कभी भी एक ही बार एक घंटे में ग्रहण करते हैं । भोजन ,पानी ,साग ,सब्जी ,दूध, फल आदि समस्त सामग्री पूर्णता उबली हुई ग्रहण करते हैं । आहार देने वाले व्यक्ति को दाता कहते है दाता के अंदर श्रद्धा ,भक्ति ,संतोष, विवेक ,क्षमा सत्य और अलोभता यह 7 गुण होना चाहिए ,एवं शराब, मांस, अंडा मछली, जुआ ,शिकार, वेश्यावृत्ति इत्यादि गलत क्रियाओं का त्यागी होना चाहिए । इन गुणों से युक्त व्यक्ति अपने घर में शुद्ध भोजन बनाकर नवधा भक्ति पूर्वक दिगंबर मुनि को बुलाकर आहार देता है । घर बुलाने की क्रिया को पड़गाहन कहते हैं। पड़गाहन के बाद उच्च आसन  पर बिठाते हैं  ,पूजा करते हैं, नमस्कार करते हैं , तदुपरांत  मैं मन ,वचन ,काया से  शुद्ध हूं एवं  मेरे द्वारा दिया जा रहा भोजन पूर्णता शुद्ध है ऐसा बोलकर विश्वास दिलाते  हैं । 

इसी को नवधा भक्ति कहते हैं । इस नवधा भक्ति के बाद दिगंबर मुनि खड़े होकर अपने हाथ की अंगुली बनाकर  मात्र 32 अंजुली प्रमाण भोजन ग्रहण करते हैं । यदि भोजन करते समय या भोजन को जाते समय मार्ग में कोई चूहा, बिल्ली ,कुत्ता इत्यादि मरा हुआ जानवर एवं आदमी का शव दिख जाए अथवा भोजन करते समय  भोजन में मरी हुई चींटी , मक्खी, नाखून , हड्डी, मास इत्यादि 32 प्रकार की अशुद्ध अभक्षय पदार्थ आ जाएं तो उस दिन मुनिराज निर्जल उपवास करते हैं। इन सब कठिनाइयों का सामना जैन मुनि इसलिए करते हैं कि इंद्रियों पर विजय प्राप्त कर सकें और कठोर से कठोर तपस्या कर योग ध्यान  कर सकें । उक्त जानकारी आज समाजसेवी  पत्रकार राकेश जैन पलंदी जी ने आचार्य श्री निर्भय सागर जी महाराज के आहार होने के उपरांत दी। उन्होंने स्वयं आचार्य श्री का पड़गाहन करके अपने घर में आहार देने का सौभाग्य प्राप्त किया।

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