आचार्य तीन प्रकार के होते हैं..आचार्य श्री निर्भय सागर
दमोह। वैज्ञानिक संत आचार्य निर्भय सागर जी महाराज ने प्रातः कालीन स्वाध्याय की कक्षा में कहा आचार्य तीन प्रकार के होते हैं, पहले श्रमण आचार्य, दूसरे प्रतिष्ठाचार्य, तीसरे गृहस्थाचार्य जो मुनि अर्थात श्रमण को शिक्षा दीक्षा देते हैं एवं स्वयं संयम, तप, त्याग, योग, ध्यान करते हैं वे श्रमणाचार्य कहलाते है। जो पंचकल्याणक प्रतिमा प्रतिष्ठा, पूजा पाठ, विधान कराते हैं वे प्रतिष्ठाचारी कहलाते हैं। जो शादी विवाह, गृह प्रवेश इत्यादि घर गृहस्ती के कार्य कराते है वे गृहस्थाचारी कहलाते हैं। भगवान की प्रतिमा की प्रतिष्ठा में श्रमण आचार्य एवं प्रतिष्ठाचार्य दोनों की उपस्थिति होना चाहिए तभी प्रतिष्ठा पूर्ण मानी जाती है और प्रतिमा पूज्य बनती है।
आचार्य श्री ने कहा भक्ति मुक्ति महल के दरवाजे पर लगे ताले को खोलने की चाबी है। भक्ति रूपी चाबी से मुक्ति महल के ताले को खोला जाता है एवं विनय के द्वारा मोक्ष महल के द्वार को खोला जाता है। गुणवान संत और भगवंत के गुणों के प्रति जो अनुराग होता है, उसके प्रति जो विनय, बहुमान, आदर सत्कार का भाव होता है उसे भक्ति कहते हैं। अथवा आराध्य के प्रति आराधक का जो निस्वार्थ, सच्चा प्रेम होता है उसे भक्ति कहते हैं ,भक्ति एक श्रेष्ठ रस है जिसको एक बार उस भक्ति के रस का स्वाद मिल जाता है उसे इंद्रिय विषय भोग के रस फीके लगने लगते हैं। भक्ति श्रद्धा की कसौटी है श्रद्धा की अभिव्यक्ति भक्ति से प्रगट होती है।
इस वर्ष दिवाली पटाखे वाली नहीं भक्ति वाली हो- आचार्य श्री ने कहा इस वर्ष दीपावली हो या नेता की रैली हो या शादी विवाह हो उसमें पटाखे नहीं चलना चाहिए क्योंकि कोरोना महामारी के कारण पटाखों के प्रदूषण से कोढ़ में खाज वाली कहावत चरितार्थ होगी। क्योंकि हमारे देश में टीवी, स्वास, अस्थमा, डायबिटीज आदि के रोगियों की संख्या बहुत है। यह पटाखे और कोरोना इन रोगियों के लिए मौत का कारण बन सकता है। दीपावली पर फटाके पर प्रतिबंध लगाना राजनीतिक मुद्दा नहीं बनना चाहिए क्योंकि यह मानव स्वास्थ्य, पर्यावरण और मानवाधिकार का मुद्दा है। सरकार को इसके प्रति शीघ्र निर्णय लेना चाहिए। पटाखों में उपयोग किया जाने वाला आरडीएस अर्थात विस्फोटक पदार्थ खरीदने वालों को लाइसेंस दिया जाता है। इसकी आड़ में कुछ लोग आरडीएक्स को बम बनाने में उपयोग करते हैं और उन बंब को आतंकवादियों और नक्सलवादियों को उपलब्ध करा देते हैं। यदि पटाखे बंद हो जाएंगे तो इस अनर्थ से बच जाएंगे। दूसरी बात यह है कि जितना आरडीएक्स एक साल में पटाखे बनाने में खर्च होता है उसे यदि रोक दिया जाए तो हमारी भारतीय सेना दुश्मनों से एक माह तक युद्ध लड़ सकती है।

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