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धन चार गति में भटकाता है, धर्म चार गतियों से पार कराता है.. धन से रोग बढ़ता, धर्म से जीवन स्वस्थ बनता.. धन का साथ इसी भव तक, धर्म परभव में भी साथ रहता.. इसलिए धर्म धन से श्रेष्ठ होता है.. आचार्य श्री निर्भय सागर

 धन इच्छा को बढ़ाता है, धर्म इच्छाओं को घटाता है..

दमोह। आचार्य श्री निर्भय सागर जी महाराज ने जैन धर्मशाला आयोजित प्रवचनों में कहा कि धन की रक्षा हमें करनी पड़ती है जबकि धर्म हमारी रक्षा करता है। धन के लिए पाप करना पड़ता है। धर्म से पाप का त्याग होता है। धन मित्रों को भी दुश्मन बना देता है, जबकि धर्म दुश्मनों को भी मित्र बना देता है। धन रहते हुए भी व्यक्ति दुःखी है, जबकि धर्म से व्यक्ति दुःख में भी सुखी है। धन इच्छा को बढ़ाता है, जबकि धर्म इच्छाओं को घटाता है। धन में लाभ हानि चलती रहती है। धर्म में फायदा ही फायदा है। धन चार गति में भटकाता है। धर्म चार गतियों से पार कराता है। धन से रोग बढ़ता है,धर्म से जीवन स्वस्थ बनता है। धन अशाश्वत है धर्म शाश्वत है। धन का साथ इसी भव तक है, धर्म परभव में भी साथ रहता है। इसलिए धर्म धन से श्रेष्ठ होता है।

 आचार्य श्री ने कहा पाप में मजबूती पुण्य से ज्यादा होती है इसलिए पाप को छोड़ने के लिए मजबूत मन चाहिए। कुछ लोग मजबूरी में पाप छोड़ते हैं। ऐसे लोगों का मन कभी भी विचलित हो जाता है और पुनः पाप में लिप्त हो जाते हैं। इसलिए पाप को बड़ी मजबूती से छोड़ना चाहिए। मजबूती से छोड़े गए पापा से पश्चाताप नहीं होता है बल्कि भूल से पाप हो जाने पर उस किए गए पाप पर पश्चाताप होते है। किसी कार्य को करने के बाद पछताने से अच्छा है कि समझदारी से विवेक पूर्वक कार्य करना चाहिए। आचार्य श्री ने कहा प्रत्येक कार्य अपनी सीमा के अंदर करना चाहिए। सीमा के बाहर कार्य करने से कार्य बिगड़ जाता है और पश्चाताप हाथ लगता है। कहा भी है अति सर्वत्र वर्जियेत। इसीलिए हर कार्य की अति गति को बिगाड़ देती है। 

आचार्य श्री ने कहा विषय भोग और कसाय रूप पाप तो बुरा होने से छोड़ने योग्य है ही लेकिन संत जीवन में उसकी चर्चा कौतूहल बस करना भी बुरा है। अन्याय अत्याचार और भोग विलास दुर्गति के कारण हैं। जिस की सही श्रद्धा,सही आचरण और सही मति होती है उसकी सही गति होती है। जिसकी मति सही होती है वह पाप से डरता है। जिसकी मति मिथ्या होती है और मोहे से ग्रसित होती है वह पाप करने से नहीं डरता है। डर बहुत सारे पाप से बचा लेता है।जो मिथ्या मति वाला होता है उसे पाप ही अच्छा लगता है। जिससे पाप अच्छा लगता है वह पापी कहलाता है। खोटे आदमी को खोट भी खोट नहीं लगती है। खोटे और छोटे आदमी को भविष्य की चिंता नहीं होती है। उज्जवल भविष्य की चिंता करने वाले लोग ना सोते हैं, ना रोते हैं और ना वे व्यर्थ में अपना समय खोते हैं। 

आचार्य श्री के दर्शनार्थ आगरा, फिरोजाबाद, एटा, टूंडला, सागर, जबलपुर नगर से भक्तगण पधारे। उन्होंने आचार्य श्री से मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया एवं आगरा पधारने का निवेदन किया।

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