Header Ads Widget

देश को चलाने के लिए जनशक्ति और धन शक्ति दोनों चाहिए.. गरीब जनशक्ति बढ़ाते हैं और अमीर धन शक्ति बढ़ाते हैं दोनों मिलकर देश को चलाते है.. वैज्ञानिक संत आचार्य श्री निर्भय सागर जी महाराज

 अमीर और गरीब दोनों को कंधे से कंधा और हाथ से हाथ मिलाकर चलना चाहिए- आचार्यश्री निर्भय सागर

दमोह। जैन धर्मशाला में चातुर्मास कर रहे वैज्ञानिक संत आचार्य निर्भय सागर महाराज ने प्रातः कालीन धर्म सभा में धन कमाने में, पढ़ाई करने में, आतंकवादियों से लड़ने में और सेवा करने में शेर के सवा शेर बनना चाहिए। मनोबल से आत्मविश्वास बढ़ाया जाता है आत्मशक्ति को उद्घाटित किया जाता है, आत्म विकास किया जाता है और खुद को जीता जाता है। वचन बल से दूसरों को उत्साहित किया जाता है, ज्ञान गुण को प्रकट किया जाता है और शिक्षा के क्षेत्र में विकास किया जाता है। काय बल से श्रम करके शरीर को स्वस्थ रखा जाता है, देश का विकास किया जाता है और शत्रुओं से लड़ा जाता है। जनसंख्या बल और धन बल से देश का संपूर्ण विकास होते हैं। 

आचार्य श्री ने कहा देश के विकास और शांति के लिए अमीर और गरीब दोनों चाहिए। गरीब और अमीर एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। सिक्के में जिस तरफ अंक लिखा होता है वह अमीर का प्रतीक है और जिस तरफ पशु, पक्षी, पेड़, फसल किसान या गांधी का चित्र होता है वह गरीब का प्रतीक है क्योंकि गरीब शारीरिक श्रम करके अमीर का भवन बनाता है, फसल उगाता है, पशु पक्षियों का पालन करता है बदले में अमीर से धन पाता है इसलिए दोनों का काम चलता है। अमीरों से देश अमीर होता है। संकट के समय अमीरों का धन काम आता है। अमीरों का धन राजा का बैंक है। जैसे अभी कोरोना वायरस से उत्पन्न हुई समस्या को सुलझाने के लिए किए गए लॉकडाउन के समय अमीरों ने अपना खजाना खोल कर गरीबों को भोजन और दवा इत्यादि की सहायता करके देश की समस्या का समाधान किया।  पुरुषार्थहीन, व्यसनी, आलसी, ईर्ष्यालु लोग ही अमीरों को और उनके धन दौलत की अमीरी को देखकर ईर्ष्या करते हैं और नफरत फैलाते हैं। 

आचार्य श्री ने कहा लोगों की अमीरी उनके पुण्य और पुरुषार्थ का फल होता है। गरीबों की गरीबी उनके पाप कर्म, मद्यपान मांस भक्षण वेश्या वृत्ति रूप व्यसन एवं पुरुषार्थहीनता का फल होता है इसलिए गरीबों को चाहिए कि वे अमीरों को देखकर ईर्ष्या ना करके मेहनत करें, व्यसनो से मुक्त रहें और फिजूलखर्ची से बचें। लोकतांत्रिक भारत जैसे देशों में अमीर लोगों की संपत्ति अर्थात नोट से देश की सत्ता चलती है और गरीब लोगों की वोट से सत्ता बनती है। देश को चलाने के लिए जनशक्ति और धन शक्ति दोनों चाहिए। गरीब जनशक्ति बढ़ाते हैं और अमीर धन शक्ति बढ़ाते हैं दोनों मिलकर देश को चलाते है। जैसे विद्युत धारा के न्यूटल और फेस दो वायर होते हैं दोनों की धारा के मिलने पर बल्ब जलता है, प्रकाश फैलता है, मशीन चलती है वैसे ही अमीर और गरीब के मिलने से देश चलता है और देश की प्रगति होती है। अमीर लोग नहीं होंगे तो गरीबों को मजदूरी नहीं मिलेगी बेरोजगारी बढ़ेगी। यदि गरीब मजदूर नहीं होंगे तो खेती, व्यापार, फैक्ट्री नहीं चलेगी इसलिए देश की प्रगति रुकेगी। अतः गरीब और अमीर हमारे देश के दो हाथ हैं या दो कंधे है। अमीर और गरीब दोनों को कंधे से कंधा और हाथ से हाथ मिलाकर चलना चाहिए। आदमी को गरीब कोई भगवान, देवी, देवता या अमीर आदमी नहीं बनाता बल्कि वह अपने स्वयं के कर्मों से बनता है। इसलिए कर्म सुधारना चाहिए, दूसरों को दोष नहीं देना चाहिए, नफरत नहीं करना चाहिए और ना भाग्य भरोसे बैठे रहना चाहिए।

 आचार्य श्री ने कहा अमीर सिर्फ धन से नहीं बनते ।सही अमीर तो मन से बनते हैं। मन के अमीर कभी गरीब नहीं होते है। मन के अमीर साधु-संतों होते हैं। धन से समृद्धि वतन में आती है। ज्ञान से समृद्धि वचन में आती है। मन से समृद्धि जीवन में आती है। मदद करने से चारों और समृद्धि आती है। मदद करने के लिए सर्वप्रथम मन चाहिए बाद में तन और धन चाहिए। जिसके पास धन ना हो वह मन और वचन से भी मदद कर सकता है।

Post a Comment

0 Comments