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अंतरंग मोह से नाता तोड़ने वाला आत्म ज्ञानी, बैरागी, भव्य जीव आत्मा होता है.. मुक्ति के मार्ग में बाहरी परिग्रह छोड़ने से अधिक महत्वपूर्ण भीतरी परिग्रह को छोड़ना.. आचार्य श्री निर्भय सागर जी

 किसी भी साधु संत और धर्म के ऊपर झूठा दोषारोपण नहीं करना चाहिए- आचार्य निर्भय सागर

दमोह। वैज्ञानिक संत आचार्य श्री निर्भय सागर जी महाराज ने कहा जैसे मकान के दरवाजे में लगाने वाले ताले दो प्रकार के होते हैं, एक बाहर कुंदे में लगाने वाला दूसरा इंटरलॉक के रूप में अंदर रहने वाला। बाहर का ताला कोई भी हथौड़ी आदि से बिना चाबी के ही खोल सकता है। वैसे ही परिग्रह दो प्रकार का है एक बाहर दिखने वाला धन, दौलत ,मकान, घोड़ा, गाड़ी आदि इसे तो कोई भी छोड़ देता है परंतु जो अंदर राग, प्रेम, मोह आदि परिणामों के रूप में अंतरंग परिग्रह होता है उसे छोड़ना सबके बस की बात नहीं है। अंतरंग मोह से नाता तोड़ने वाला आत्मज्ञानी, बैरागी, भव्य जीव आत्मा ही होता है। ऐसा व्यक्ति बीतरागी बनकर परमात्म पद को प्राप्त करता है। मुक्ति के मार्ग में बाहरी परिग्रह छोड़ने से अधिक महत्वपूर्ण है भीतरी परिग्रह को छोड़ना। 

 आचार्य श्री ने कहा किसी भी साधु संत और धर्म के ऊपर झूठा दोषारोपण नहीं करना चाहिए। जो दोषारोपण करता है वह अपनी आत्मा का पतन कर देता है। वर्तमान में सबसे ज्यादा दोषारोपण, आरोप-प्रत्यारोप राजनीति के क्षेत्र में हो रहा है। राजनैतिक क्षेत्र में न्याय नीति को लेकर भी धंधा हो रहा है। इसी कारण से राजनैतिक क्षेत्र का माहौल गंदा हो गया है। यदि यही स्थिति रही तो देश का विनाश होने में समय नहीं लगेगा ।लोकतंत्र में राजनीति सेविंग के लिए नहीं, सेवा के लिए होती है। लेकिन आज के नेता धन के शेविंग करने में लगे है, सेवा में नहीं। यदि सेवा करते भी हैं तो अपने स्वार्थ के लिए करते हैं।

 आचार्य श्री ने कहा जिससे प्रेम होता है, वास्तविक लगाव होता है, उसके ना मिलने पर वैसी ही दशा होती है जैसी पानी के बिना मछली की होती है। ऐसा लगाव पत्नी के प्रति नहीं परमात्मा के प्रति होना चाहिए। पैसे के प्रति नहीं पुण्य के प्रति होना चाहिए। धंधे के प्रति नहीं धर्म के प्रति होना चाहिए। जिस इंसान के कर्म अच्छे होते है, उस के जीवन में कभी अँधेरा नहीं होता है। वह इंसान आने वाले कल की चिंता करता है और ना बीते हुए कल का अफसोस करता है। वह आने वाले कल की योजना जरूर बनाता है । चिंता और नफरत दो ऐसे चोर हैं जो हमारी सफलता और खूबसूरती को चुरा लेते है। प्रशंसा और सम्मान की भूख अयोग्यता की परिचायक है। यदि प्रशंसा और सम्मान चाहिए हो तो काबिल बनना चाहिए। काबिलियत की तारीफ तो विरोधियों के भी दिल से निकलती है। मंजिल को पाने के लिए अपने हौसलों को बनाए रखना चाहिए। जिंदगी मंजिल नहीं सफर है करते रहना चाहिए। जीवन में सकारात्मक सोच वालों का सपना पूराहोता है हिम्मत वालो का इरादा पूरा होता है।

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