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धन दौलत और इंद्रिय विषयों की अति लोलुपता का नाम वासना है.. व्यसन हो या वासना इन दोनों में भगवान की उपासना, सच्चा स्नेह और ईमानदारी समाप्त हो जाती है.. आचार्यश्री निर्भय सागर जी

  आचार्यश्री निर्भय सागर महांराज के मंगल प्रवचन..

दमोह। वैज्ञानिक संत आचार्य श्री निर्भय सागर जी महाराज ने प्रातः कालीन धर्म सभा में कहा बलात का अर्थ है जबरदस्ती और कार का अर्थ है करना। अतः जबरदस्ती करने को बलात्कार कहते हैं। जबरदस्ती करना अन्याय अनीति के अंतर्गत आता है। जब आदमी के दिल में सहजता, सरलता और समता नहीं रहती है तब वह जबरदस्ती करता है। जबरदस्ती करना हट ग्रहीता के अंतर्गत आती है। हटग्राही मूड अज्ञानी और अंध श्रद्धानी होता है। अंधश्रद्धा और अंधविश्वास में कोई अंतर नहीं है। जहां समीचीन विश्वास है वहां अंधविश्वास नहीं है और जहां अंधविश्वास है वहां सच्चा विश्वास नहीं है। आचार्य श्री ने कहा धन दौलत और इंद्रिय विषयों की अति लोलुपता का नाम वासना है। अति लोलुपता ही व्यसन है। व्यसन हो या वासना इन दोनों में भगवान की उपासना, सच्चा स्नेह और ईमानदारी समाप्त हो जाती है इसलिए जहां सच्चा विश्वास है  वहां सच्चा स्नेह है, वहां वासना नहीं बल्कि सच्ची उपासना है। आज आचार्यश्री को आहारदान का सौभाग्य राजेश हिनौती परिवार को प्राप्त हुआ।

आचार्य श्री ने कहा भगवान महावीर स्वामी ने दुनिया को नहीं जीता बल्कि अपनी इंद्रिय और मन को जीता है। जो अपने आपको जीत लेता है वह दुनिया को बिना जीते ही जीत लेता है। आचार्य श्री ने कहा स्वयं के कर्मों से लड़ने वाले को दुनिया से नहीं लड़ना पड़ता है। स्वयं को जीतने वाला दुनिया को बिना युद्ध के जीत लेता है। स्वयं के दिल को जीतने वाला दूसरों के दिल को जीत लेता है। इसीलिए किसी के दिल और देश को मत जीतिए बस किसी का दिल जीतिए,सब अपने आपसे हार जायेंगे और आप जीत जाएंगे। चुनाव वही जीतता है जो दूसरों के दिल को जीत लेता है। दूसरों के दिल को जीतने के लिए ही प्रत्याशी तरह-तरह की योजना बनाकर मदद करता है, सेवा और प्रशंसा करता है। दूसरों की बढ़ती को देखकर जलना नहीं चाहिए। दूसरों की बढ़ती को देख कर जलने से स्वयं का दिल जल जाता है। दूसरों के दिल जलाकर किये गए कार्य  से, किसी भी प्राणी को कभी भी सच्चा आत्म प्रकाश नहीं मिलता है और कोई भी कार्य समय पर निर्विरोध संपन्न नहीं होता है। हर कार्य समय पर करना चाहिए। समय पर किए गए कार्य से विश्वसनीयता बढ़ती है। कार्य में सफलता मिलती है और हर जगह प्रशंसा होती है। जबकि असमय में किये हुए कार्य का फल इससे विपरीत होता है इसीलिए टाइम इज गोल्ड कहा जाता है। आचार्य श्री ने कहा पाप बड़े-बड़े बलवानों को निर्बल और निर्दयी बना देता है। निर्दयी व्यक्ति किसी की दया का पात्र भी नहीं बन पाता है।

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