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उत्तर या पूर्व दिशा में मुख करके पूजा पाठ एवं अध्ययन करने से सुख, शांति, पुष्टि और समृद्धि होती है.. जिसको अपनी दुर्दशा ठीक करना हो उसे गुरु के सम्मुख बैठना चाहिए.. वैज्ञानिक संत आचार्य श्री निर्भय सागर जी

 भक्ति मार्ग मुक्ति का मार्ग है आचार्य निर्भय सागर 

दमोह। वैज्ञानिक संत आचार्य श्री निर्भय सागर जी महाराज ने प्रातः कालीन धर्म सभा में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा वास्तु शास्त्र अनुसार उत्तर अथवा पूर्व दिशा में मुख करके पूजा, पाठ, मंत्र जाप एवं अध्ययन करना श्रेष्ठ बतलाया है। इसलिए पूजक  को एवं विद्यार्थियों को पूर्व या उत्तर मुख करके पूजा, भक्ति एवं अध्ययन करना चाहिए। उत्तर या पूर्व दिशा में मुख करके पूजा पाठ एवं अध्ययन करने से सुख, शांति, पुष्टि मिलती है और समृद्धि होती है। लेकिन जहां भगवान की प्रतिमा हो अथवा गुरु सामने हो वहां उनके सम्मुख बैठना ही  श्रेष्ठ है ।वहां दिशा का कोई दोष नहीं होता । जिसको अपनी दुर्दशा ठीक करना हो उसे गुरु के सम्मुख बैठना चाहिए । 

आचार्य श्री ने कहा पूजा भक्ति चाहे बैठकर करो या खड़े होकर करो पर अवश्य करो। भक्ति पूजन में परंपरा या पंथ बाद नहीं होना चाहिए ।भक्ति मार्ग तो मुक्ति का मार्ग है। यदि खड़े होकर भक्ति करते हैं तो तप, विनय, आदर एवं बहूमान अधिक होने से पाप कर्म जल्दी नष्ट हो जाते है। इसलिए बैठकर भक्ति करने की अपेक्षा खड़े होकर भक्ति करना श्रेष्ठ है।आचार्य श्री ने कहा अन्याय अनीति से धन अर्जन ना करना चाहिए और ना ही अन्याय अनीति के कार्यों में धन को खर्च करना चाहिए । जितना धन कमाया जाए उसका 10% दान पुण्य के क्षेत्र में खर्च करना चाहिए । जैसे सरकार कहां कितना खर्च करना है ऐसा बजट बनाती है। वैसे ही प्रत्येक परिवार वालों को अपने दैनिक खर्च के बजट के साथ ही धर्म के क्षेत्र में खर्च करने का बजट बनाना चाहिए । दान पूजा रूप  धर्म कार्य करने से पुण्य की प्राप्ति होती है । पुण्य से परमात्म पद की प्राप्ति होती है । लेकिन पुण्य के क्षय करने से मुक्ति मिलती है इसलिए पुण्य से परमात्मा बन सकते हैं परंतु मोक्ष नहीं जा सकते हैं ।सिद्ध पद पाने के लिए पुण्य को भी छोड़ना पड़ता है। 

आचार्य श्री ने कहा भक्ति विनय पूजा मैं पंथबाद ,संतबाद ,ग्रंथ बाद नहीं होना चाहिए ।पूजा अंतरंग परिणामों का विषय है बाहरी किया तो सिर्फ औपचारिक है । बाहरी क्रिया अंतरंग के परिणामों को विशुद्ध बनाने के लिए होती है ।आचार्य श्री में बाल विवाह के संबंध में बतलाया के जब नारी मासिक धर्म से युक्त हो जाती है तो वह बाल कन्या ना होकर तरुणी मानी जाती है और भारतीय संस्कृति के अनुसार वह कन्या शादी के योग्य है ।ऐसी स्थिति 16 साल के आसपास कन्या में आ जाती है। जो बालिकाएं अध्ययनरत है वे भले ही 28 साल में शादी करें परंतु गांव देहात में रहने वाली कन्याओं की शादी सत्रह अठारह साल में होती है तो उसे हम बाल विवाह नही कहेंगे । इस उम्र की लड़कियां शादी के बाद अपनी ससुराल में शीघ्र ही घुल मिल जाती है, सामंजस्य बना लेती है, एडजेस्टर हो जाती है ,28 -30 साल में शादी करने वाली लड़की ससुराल में अपने आप को असहज महसूस करती है और शीघ्र घुल मिल नहीं पाते है, इसलिए लगभग 20 साल की उम्र में शादी तय कर देना चाहिए और उन्हें पढ़ते रहना चाहिए पढ़ाई पूरी होने पर दांपत्य जीवन जीना चाहिए..

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