विचारों का आदान प्रदान करने वाले परमात्मा बनते हैं..
दमोह। वैज्ञानिक संत आचार्य श्री निर्भय सागर जी ने कहा वाणी की मिठास और प्रेम की गंध दुश्मन को भी आकर्षित करती है। मां दुनिया की अनुपम कृति है, मां का भोजन, मां का प्रेम, मां के वाणी, मां की सलाह, मां की ममता और मां की शिक्षा संतान के लिए गुरु और प्रभु से बढ़कर होती है। अन्यायी को सच, कड़वा जहर सा लगता है। न्याय प्रिय को सच्चा अमृत सा लगता है। सलाह देने लाखों है ,पर सहयोग देने वाला लाखों में एक मिलता है। आज की दुनिया में सलाह बिन मांगे, बिन पैसे की मिल जाती है, लेकिन सहयोग पैसा देने पर भी नहीं मिलता है।
आचार्य श्री ने कहा जीवन में यदि सुख और शांति चाहिए तो त्याग और संयम को धारण करना चाहिए । धन का आदान -प्रदान करने से जितना है, उतना ही रहेगा, लेकिन विचारों का आदान प्रदान करने से विचार दोगुनी गति से बढ़ते हैं। विचारों का आदान प्रदान करने वाले एक दिन स्वयं परमात्मा बन जाते है । विचारों का शेयर मार्केट कभी डाउन नहीं होना चाहिए । सर विचारों का शेयर मार्केट जितना उछाल लिए होगा उतने ही जल्दी जीवात्मा उछलकर परमात्मा के निकट पहुंच जाएगा और आत्मा अनंत गुणों का धनी हो जाए । आचार्य श्री ने कहा जिंदगी का अर्थ और जिंदगी जीने की कला दूसरो से सीखने की अपेक्षा खुद से ही शीघ्र समझ में आ जाती है। इसलिए जिंदगी के अर्थ को दूसरे से नहीं सीखना चाहिए । लेकिन दूसरों से सलाह लेना चाहिए और दूसरों की जिंदगी को देख कर कुछ ज्ञान भी करना चाहिए।
आचार्य श्री ने कहा जिंदगी का रहस्य संयुक्त परिवार में रहने से समझ में आता है । आत्मा का रहस्य एकांत निर्जन स्थान में अकेले रहने में समझ आता है। आत्मा का रहस्य समझ में आ जाने पर पर द्रव्य से मोह नहीं रह जाता है । आत्मा का आत्मा से प्रेम हो जाना ही सम्यक दर्शन है ।आत्मा से प्रेम होने के बाद वह आत्म प्रेमी एक समय भी व्यर्थ में नहीं खोता है । मोह को जीतने वाले की कभी हार नहीं होती है । मोह करने वाला दूसरों को भले मोहित कर ले लेकिन निजात्मा और परमात्मा को मोहित नहीं कर पाता है । जो निजात्मा की महिमा, सुंदरता, शक्ति और गुणों से अनभिज्ञ रहता है वही दूसरों की महिमामंडित करता है और प्रभावित होता है आत्मज्ञानी नहीं।


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