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सुख दो प्रकार का होता हैं एक इंद्रिय सुख दूसरा आत्मिक सुख.. सात स्थानों पर दान देने वाला एक दिन स्वयं भगवान बन जाता है.. वैज्ञानिक संत आचार्य श्री निर्भय सागर जी महाराज..

 7 स्थानों पर दान देने से परमात्म पद मिलता है-आचार्य श्री 

दमोह। वैज्ञानिक संत आचार्य श्री निर्भय सागर जी महाराज ने जैन धर्मशाला में कहा सुख दो प्रकार का होता हैं। एक वह जो प्रत्यक्ष मन, वचन और काय से अनुभव में आता है इसे इंद्रिय सुख कहते हैं। इंद्रिय सुख को सांसारिक सुख, अभ्युदय सुख ,ईह लोक सुख, क्षणिक सुख नाम से भी कहा जाता है। यह सुख प्रत्यक्ष देखने में एवं अनुभव में आता है इसलिए हर व्यक्ति इस सुख को चाहता है। यह सुख मोह से युक्त होने से सब को अच्छा लगता है । मोह के कारण दूसरे प्रकार का जो आत्मिक, वास्तविक, स्थाई, नैसर्गिक, परलोक या मोक्ष सुख है उसे इंसान भूल जाता है । इस सुख की चाहत आस्थावान, भेद विज्ञान से युक्त अध्यात्मवादी योगी चाहता है,भोगी नहीं।

 आचार्य श्री ने कहा दान पूजा करने वाला अध्यात्मवादी, आस्थावान घर में रहने वाला व्यक्ति भी सांसारिक इंद्रिय सुख और पारलौकिक मोक्ष सुख दोनों को प्राप्त कर सकता है। व्रत, उपवास, त्याग, तपस्या, दान ,पूजा से दोनों प्रकार के सुखों को  प्राप्त कर सकते हैं । इसी उद्देश्य  इंद्री और विषय का कषायो को जीत कर नवरात्रि पर्व, पर्यूषण पर्व ,अस्टानिका पर्व के व्रत उपवास किए जाते हैं । आचार्य श्री ने कहा दान सात स्थान पर देना चाहिए। इन स्थानों पर  दान देने वाला एक दिन स्वयं भगवान बन जाता है । दान देने के सात स्थान है -मंदिर निर्माण, प्रतिमा की प्रतिष्ठा, तीर्थ यात्रा, गरीब असहाय को  भोजन, भगवान की पूजा, गुरु को आहार दान एवं शेष बचा हुआ धन सर्वदत्ती के रूप में अपनी संतान। जो इन स्थानों पर दान देकर संयास आश्रम धारण करता है भगवान बनता है

आचार्य श्री ने कहा इसी कारण जैन मुनि समस्त परिवार को त्याग कर सन्यास आश्रम धारण कर लेते हैं। जो सन्यास आश्रम धारण करके समाधि पूर्वक मरण करता है उसे मरने के बाद मुख  ढक कर एवं अर्थी पर लिटा कर मसान घाट में ही ले जाती हैं । बल्कि विमान में बैठा कर ले जाते हैं । ऐसे व्यक्ति को स्वर्ग के विमान मिलते है। जो यहां धार्मिक क्षेत्रों पर गंदगी फैलाता है,गंदे वस्त्र एवं शरीर होने पर धार्मिक क्रिया करता है उसे धर्म के प्रभाव से स्वर्ग तो मिल जाता है लेकिन गंदे कार्य के कारण वहां स्वर्ग में किलविश जाति के देव बनकर गंदगी आदि सफाई का कार्य करना पड़ते हैं । जो व्यक्ति दान पूजा आदि धार्मिक कार्य को भार मानकर करता है उसे स्वर्ग में वाहन जाति के देव बनना पड़ता है और जिंदगी भर बड़े देवों के वाहन बनकर सवारी का कार्य करना पड़ता है। 

आचार्य श्री ने कहा इसलिए धार्मिक क्षेत्रों में गंदगी नहीं फैलाना चाहिए, गंदे वस्त्र आदि पहन कर धर्म कार्य नहीं करना चाहिए और भार मानकर धार्मिक कार्य नहीं करना चाहिए । जो व्यक्ति दान पुण्य आदि धार्मिक क्रियाएं स्वयं ना करके नौकरों से करवाता है और स्वयं साहब बनकर बैठा रहता है उस व्यक्ति को दान पुण्य के फल से भोग ,उपभोग की वस्तुएं प्राप्त होती है ,लेकिन स्वयं डाय बिटीज ,कोलेस्ट्रोल ,हाई ब्लड प्रेशर आदि रोगों से ग्रसित होता है ,जिससे वह उस पुण्य के फल से  प्राप्त भोगों को भोग नहीं पाता है । उसे नौकर ही भोगता  है । वह बेचारा दाल का पानी और रूखा सूखा भोजन बिना नमक, मीठा, घी ,दूध ,मलाई के ही खाता है। 

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