Header Ads Widget

अहंकार पैदा करने वाला ज्ञान जहर के समान होता है.. व्यक्ति नहीं व्यक्तित्व पूज्य है, चेहरा नहीं चरित्र पूज्य है.. पूजा छह प्रकार की होती है, भगवान का नाम लेना भी नाम पूजा है.. आचार्य श्री निर्भय सागर जी

 अहंकार पैदा करने वाला ज्ञान जहर के समान आचार्य श्री

 दमोह। वैज्ञानिक संत आचार्य श्री निर्भय सागर जी महाराज ने जैन धर्मशाला में उपदेश देते हुए कहा अंग्रेजी सीखिए क्योंकि भाषा सीखना अच्छा है, लेकिन अपनी संस्कृति संस्कार और इतिहास को मत भूलिए । अंग्रेजी यत से बचिए। यदि अंग्रेजियत के चक्कर में पड़ जाओगे तो देश की संस्कृति संस्कार और इतिहास मिट जाएगा। हमारा देश स्वर्ग से भी अच्छा है। हिंदी भाषा देवों की भाषा से भी अच्छी है, इसीलिए हर देश के व्यक्तियों की दृष्टि हमारे देश पर लगी हुई है । 

आचार्य श्री ने कहा व्यक्ति नहीं व्यक्तित्व पूज्य है। चेहरा नहीं चरित्र पूज्य है। इस कलिकाल में अदृश्य परमात्मा या आतदाकार परमात्मा की मूर्ति पूजा की अपेक्षा भगवान की आकृति जैसी तदाकार मूर्ति रखकर पूजना श्रेष्ठ है। तदाकार अर्थात भगवान जैसी हुबहू  मूर्ति रखकर पूजने से पूजा में मन ज्यादा लगता है इसीलिए प्रथमा बनाकर प्रतिष्ठा कराते हैं और पूजा करते हैं।  पूजा छह प्रकार की होती है। नाम पूजा ,स्थापना पूजा ,द्रव्य पूजा ,भाव पूजा ,काल पूजा एवं क्षेत्र पूजा। भगवान का नाम लेना ही नाम पूजा है । भगवान की प्रतिमा स्थापित करना स्थापना पूजा है । जल ,चंदन ,अक्षत आदि पदार्थों से पूजा करना द्रव्य पूजा है । भगवान के गुणानुवाद में मन का लग जाना भाव पूजा है । जिस समय जिन भगवान का जन्म या मोक्ष कल्याणक हुआ है उस समय उनकी पूजा करना काल पूजा है । जिस स्थान पर जिन भगवान का जन्म या मोक्ष कल्याणक हुआ है उस स्थान पर जा कर पूजा करना क्षेत्र पूजा है। पूजा पूजक को पूज्य बनाती है। दान पूजा और विशेष ज्ञान के बाद अहंकार का जन्म नहीं होना चाहिए । सम्यक ज्ञान और दान वही है जो अहंकार को कुचल दें, विनय, श्रद्धा ,भक्ति, नम्रता से भर दे । सम्यक ज्ञान अमृत का काम करता है । जो ज्ञान अहंकार पैदा करता है  वो ज्ञान मिथ्या  ज्ञान है। अहंकार पैदा करने वाला ज्ञान जहर काम करता है । जिस ज्ञान के बाद श्रद्धा भक्ति विनय नम्रता का जन्म होता है निज और पर दोनों के लिए कल्याणकारी होता है । 

 आचार्य श्री ने कहां  जीवन में हमेशा उत्साह  बनाकर रखना चाहिए। उत्साह बनाकर कार्य करने से  सफलता मिलती है  और थकान नहीं होती है। योगी  त्याग तपस्या एवं निर्जल व्रत उपवास करके भी उत्साहवन बने रहते हैं ।यदि  योगी थक जाते हैं तो वे ही आत्मा में विश्राम पाकर थकान को दूर करते हैं। मोह माया अक्ल के ताले को बंद कर देता है। इसलिए मोह माया में फंसे लोगों को दिव्य केवल ज्ञान प्राप्त नहीं होता और मुक्ति भी प्राप्त नहीं होती है । छल कपट मोह मायाजाल में फंसे लोगों का धर्म बनावटी होता है।बनाबटी धर्मात्मा को नहीं,निश्छल निष्कपट धर्मात्माओं को संसार के दुखों से मुक्ति मिलती है। इसीलिए जीवन छल कपट वाला नहीं बल्कि इमानदारी वाला जीना चाहिए। दया से युक्त व्यक्ति का स्वभाव मृदु होता है ,लेकिन जिसके ह्रदय में दया नहीं होती है,वो निर्दई क्रूर होते है।योग्य व्यक्ति को  सफलता से कोई नहीं रोक सकता है।इसलिए योग्यता प्राप्त करना चाहिए।सच्चाई मात्र कहने की ही नहीं,मानने  की चीज है।जीवन में अपनी कीमत कम न कराना हो तो कभी हल्के काम मत करो एवं ईमानदारी को मत भूलो।

Post a Comment

0 Comments