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भाजपा में मेहनत, निष्ठा और उपेक्षा के बीच जूझता एक युवा चेहरा हरि रजक.. युवा लीडर की कहानी उसी की जुबानी..

निष्ठा- उपेक्षा के बीच जूझता एक युवा चेहरा – हरि रजक

दमोह। भारतीय जनता पार्टी जैसे विशाल संगठन में हजारों कार्यकर्ता अपनी निष्ठा, समर्पण और अथक परिश्रम के साथ पार्टी को मजबूत बनाने में जुटे रहते हैं। इन्हीं कार्यकर्ताओं में एक नाम है हरि रजक का एक ऐसा युवा चेहरा, जिसने वर्षों से बिना किसी स्वार्थ के संगठन के लिए लगातार कार्य किया, लेकिन जब बात बड़े दायित्वों की आती है, तो वह खुद को उपेक्षित पाता है।

हरि रजक का राजनीतिक सफर किसी पद या प्रतिष्ठा से नहीं, बल्कि जमीनी स्तर के संघर्ष और संगठन के प्रति समर्पण से शुरू हुआ। हरि रजक पिछड़ा वर्ग मोर्चा में नगर महामंत्री के रूप में अपनी जिम्मेदारी को पूरी ईमानदारी से निभाया। इसके बाद युवा मोर्चा में भी नगर महामंत्री के पद पर रहते हुए उन्होंने संगठनात्मक गतिविधियों को मजबूती दी, युवाओं को जोड़ा और पार्टी की विचारधारा को जन-जन तक पहुंचाने का कार्य किया। हरि की पहचान एक ऐसे कार्यकर्ता की रही है, जो हर कार्यक्रम में अग्रणी भूमिका निभाता है, चाहे वह बूथ स्तर का कार्य हो या बड़े आयोजन। हरि रजक ने बिना किसी अपेक्षा के दिन-रात संगठन को समय दिया, लेकिन जब संगठन में बड़े पदों या दायित्वों की बात आती है, तो अक्सर मेहनती और जमीनी कार्यकर्ताओं की बजाय ‘चहेते’ लोगों को प्राथमिकता दी जाती है।

यही वह बिंदु है, जहां हरि रजक जैसे समर्पिIत कार्यकर्ता खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं। वर्षों की मेहनत, निष्ठा और संगठन के प्रति समर्पण के बावजूद उन्हें वह अवसर नहीं मिल पाता, जिसके वे वास्तविक हकदार हैं। यह केवल हरि रजक की व्यक्तिगत पीड़ा नहीं है, बल्कि ऐसे कई कार्यकर्ताओं की सामूहिक भावना है, जो संगठन को मजबूत करने में अपना सब कुछ लगा देते हैं, लेकिन पहचान और दायित्व से वंचित रह जाते हैं। राजनीति में यह प्रवृत्ति नई नहीं है, जहां योग्यता और मेहनत की बजाय व्यक्तिगत समीकरण और पसंद-नापसंद को महत्व दिया जाता है। लेकिन यदि किसी भी संगठन को दीर्घकालीन रूप से मजबूत बनाना है, तो उसे ऐसे समर्पित कार्यकर्ताओं की कद्र करनी होगी, जो बिना किसी स्वार्थ के संगठन की नींव को मजबूत करते हैं।

हरि रजक जैसे युवा आज भी संगठन के प्रति पूरी निष्ठा के साथ कार्य कर रहे हैं। उनके भीतर कोई कड़वाहट नहीं, बल्कि उम्मीद है—उम्मीद इस बात की कि एक दिन उनकी मेहनत को उचित पहचान मिलेगी और संगठन में योग्यता को ही प्राथमिकता दी जाएगी। अंततः यह सवाल केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का है, जिसमें मेहनत और निष्ठा का मूल्यांकन होना चाहिए। यदि संगठन अपने जमीनी कार्यकर्ताओं को पहचान देगा, तो न केवल उनका मनोबल बढ़ेगा, बल्कि संगठन और अधिक सशक्त और जन-आधारित बनेगा। हरि रजक जैसे युवा ही किसी भी राजनीतिक संगठन की असली ताकत होते हैं जरूरत है, तो सिर्फ उन्हें पहचानने और आगे बढ़ाने की।

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