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दमोह जिला जेल में मुनिश्री श्रुतेश सागर जी श्री सुश्रुत सागर जी के मंगल प्रवचन.. अनेक कैदियों ने मांसाहार मदिरा का त्याग करने का संकल्प लिया..

जेल में मुनिश्री श्रुतेश सागर, सुश्रुत सागर जी के प्रवचन

दमोह। जिला जेल में मुनिश्री श्रुतेश सागर जी एवं मुनि श्री सुश्रुत सागर जी महाराज के मंगल प्रवचन हुए अनेक कैदियों ने मांसाहार मदिरा का त्याग किया समिति के द्वारा कैदियों को मिष्ठान वितरण किया गया भाई जी मंदिर एवं चातुर्मास समिति के द्वारा जिला जेल उपाधीक्षक एस एल पटेल एवं अन्य अधिकारियों कर्मचारियों का सम्मान किया गया। कार्यक्रम के प्रारंभ में बड़े बाबा एवं छोटे बाबा के चित्र के समक्ष जिला जेल उपाधीक्षक एवं आचार्य विद्यासागर वृती आश्रम के अध्यक्ष रूपचंद जैन चंदकुमार दिनेश सेठ पार्षद सतीश बाबा विनय जैन आदि ने ज्ञान ज्योति का प्रज्वलन किया..
जिला जेल उपधीक्षक ने मुनि संघ को श्रीफल भेंट किया कार्यक्रम का संचालन सुनील वेजीटेरियन एवं विकल्प जैन किया। इस मौके पर मुनि श्री सुश्रुत सागर जी महाराज ने अपने मंगल प्रवचन में कहा कि जो मर्यादा तोड़ता है वह रावण की तरह दंड पाता है और जो मर्यादा का पालन करता है वह राम की तरह पूजा जाता है यह जीव अनादि काल से संसार रूपी जेल में भटक रहा है कर्मों की सलाखों को काटकर वह मुक्त हो सकता है मानव को 84 लाख योनि में भटकते हुए बड़ी दुर्लभता से मनुष्य योनि प्राप्त होती है और वह पाप करके नरक योनि में चला जाता है क्रोध मान माया लोभ आदि से प्रभावित होकर मनुष्य खोटे कर्म कर सलाखों के पीछे आ जाता है तन से गलत कार्य करने वालों को समाज दंड देती है जबकि मन से गलत कार्य करने वाले अपने कर्मों से दंड पाते हैं..
जेल में भी धर्म ध्यान करते हुए शांति और भाईचारा से रहकर मनुष्य अपने जीवन को सुधार सकता है जेल कारावास नहीं बल्कि सुधारग्रह है जीवन कैसे उन्नत हो इसके लिए प्रयास करना चाहिए। मुनि श्री श्रुतेश सागर जी महाराज ने अपने मंगल उद्बोधन में कहा कि संत समागम और हरि भजन बहुत दुर्लभता से प्राप्त होते हैं लक्ष्मी तो पापी के यहां भी हो जाती है किंतु सद्बुद्धि संतों से ही प्राप्त होती है कृष्ण जी ने तो जन्म ही जेल में लिया था किंतु उनका जीवन इतना श्रेष्ठ था कि वे पूज्य बन गए आप भी ऐसे कार्य करो कि आपका जीवन पवित्र बन जाए आप भी परमात्मा के अंश हो राम और रावण की राशि एक थी किंतु एक को जलाया जाता है और एक को पूजा जाता है यह सब अपने अपने कर्मों की लीला है..
राम दशरथ के बड़े पुत्र थे किंतु राम ने राज नहीं चाहा पिता के वचन के लिए राम वन चले गए और राम बन गए रावण की सोने की लंका थी और 18 हजार रानी थी किंतु वह अशांत था राम वन में रहकर भी शांत थे रावण ने सीता पर बुरी दृष्टि डाली और रावण की लंका दू दू करके जल गई प्रत्येक व्यक्ति के अंदर राम भी है और रावण भी है अच्छे विचार राम बनाते हैं और बुरे विचार  रावण बना देते  हैं पत्थर में भगवान देखने वालों हर आत्मा में भगवान देखने लगे तो सभी समस्याओं का हल हो जाए जो ज्ञान से परिपूर्ण है वह भगवान है राम वन में गए तो भगवान बन गए सीता को भी अग्नि परीक्षा देनी पड़ी सत्य के मार्ग पर चलने पर संघर्ष झेलने पड़ते हैं सब में परमात्मा है यही भाव मनुष्य को महात्मा बना देता है।

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