किताब ने करो 10 का विमोचन मंत्री श्री लोधी ने किया
दमोह। सत्येंद्र
तुलाराम साहू के द्वारा लिखित किताब ने करो 10 का विमोचन प्रसिद्ध फ़िल्म
अभिनेता मुकेश तिवारी और रघुवीर यादव व पर्यटन मंत्री धर्मेंद्र सिंह ने
किया. बुंदेलखंड फ़िल्म फेस्टिवल के आयोजन में 10 जनवरी को कार्यक्रम में
राधिका पैलेस दमोह में मुंबई से आकर प्रसिद्ध फ़िल्म अभिनेता मुकेश तिवारी,
रघुवीर यादव पर्यटन मंत्री धर्मेंद्र सिंह, भाजपा जिलाध्यक्ष श्याम
शिवहरे,रामगोपाल जी, जिला पंचायत अध्यक्ष रंजीता गौरव पटेल,अभिषेक दीपू
भार्गव, सिद्धार्थ मलैया,लकी पटेल ने किया..
कार्यक्रम आयोजक
सत्येंद्र सिंह, मंच संचालक राजीव अयाची का विशेष सहयोग रहा. लेखक
सत्येंद्र तुलाराम साहू ने बताया कि नकरात्मक से सकरात्मक की ओर अलख जगाने
की कोशिश कर रहा हूँ.ने करो 1 से 10 संस्करण पढ़ने के लिए प्लेस्टोर, गूगल
बुक्स, अमेज़ॉन, फ्लिपकार्ट, कोबो पर बुक कर सकते है. ने करो दसवमां संस्करण
की लिंक पर बुक कर जरूर पढ़ें. इधर
उधर बिखरे पड़े विचारों, उक्तियों, सुक्तियों से सजाकर ने करो प्रथम
संस्करण से दसवें संस्करण किताब की अपार सफलता के बाद ने करो 11 ग्यारवाँ
संस्करण भी लिखकर प्रकाशित करने की कोशिश करूंगा.
ब्र. डालचंद बड़कुल का बड़े बाबा के चरणों में समाधिमरण
दमोह।
कुण्डलपुर में युगश्रेष्ठ, संत शिरोमणि परम पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर
जी महाराज, विद्यानिधि आचार्य श्री समयसागर जी महाराज के मंगल आशीर्वाद से
स्थानीय उदासीन आश्रम में पचासों वर्षों से साधनारत सप्तम प्रतिमा धारी
ब्रह्मचारी श्री डालचंद जी बड़कुल पटेरा की आज 10 जनवरी 2026 प्रातः पूज्य
बड़े बाबा के चरणों में कुंडलपुर सिद्धक्षेत्र पर समाधि हो गई। श्रद्धेय
बड़कुल जी का कुण्डलपुर के बड़े बाबा, छोटे बाबा के प्रति समर्पण सदैव
स्मरण किया जाता रहेगा।जब तक शरीर ने साथ दिया तब तक बड़े बाबा के चरणों
में जाकर अभिषेक, शांतिधारा , पूजन ,विधान में भाग लिया। आचार्य श्री एवं
परंपराचार्य श्री का विशेष आशीर्वाद सदैव प्राप्त होता रहा। कुण्डलपुर
क्षेत्र कमेटी अध्यक्ष चंद्रकुमार सराफ सहित सभी पदाधिकारी सदस्य कुण्डलपुर
क्षेत्र के प्रति सदैव समर्पित ऐसी दिव्य आत्मा के प्रति अपने भाव पुष्प
समर्पित करते हुए पूज्य बड़े बाबा से प्रार्थना करते है कि पूज्य बड़े बाबा
के श्री चरणों में आपको स्थान प्राप्त हो। कुण्डलपुर क्षेत्र कमेटी के
प्रचार मंत्री जयकुमार जैन जलज ने बताया कि इस वर्ष 15 अगस्त को कुण्डलपुर कार्यालय परिसर में श्रद्धेय वयोवृद्ध ब्रह्मचारी
श्री डालचंद बड़कुल जी द्वारा ध्वजारोहण संपन्न हुआ था।
ईको क्लब द्वारा स्वच्छता अभियान में सहभागिता.. दमोह। स्थानीय प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस, ज्ञानचंद श्रीवास्तव शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, दमोह में पर्यावरण नियोजन एवं समन्वय संगठन(एप्को) द्वारा प्रायोजित पर्यावरण हितैषी जीवन शैली अपनाने हेतु स्वच्छता अभियान महाविद्यालय के खेल परिसर, उद्यान एवं प्रांगण में आयोजित किया गया। यह अभियान महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. ए.के.जैन के दिशा निर्देशन एवं ईको क्लब प्रभारी डॉ. मीरा माधुरी महंत के मार्गदर्शन में संपन्न हुआ।
स्वच्छता अभियान के पश्चात स्थानीय उद्यानिकी तथा खाद्य प्रसंस्करण विभाग में हो रहे एक दिवसीय ट्रेनिंग में ईको क्लब के स्वयं सेवकों द्वारा सहभागिता की गई। जिसमें उद्यान अधीक्षक एवं उनके सहयोगियों के द्वारा पौधों में कटिंग प्रजनन विधि, ग्राफ्टिंग, चीप, विनेगर विधि, वर्मी कंपोस्ट, वर्मी बेड सेटअप एवं पौधों के संरक्षण में पॉलीहाउस या नेटहाऊस की उपयोगिता तथा महत्व पर ट्रेनिंग सहित वृहद जानकारी प्रदान किए। इस अवसर पर अतिथि विद्वान डॉ. ऋषिभा दीक्षित, श्री गौरीशरण पटेल एवं श्री मनीष पटेल की विशेष सहयोग व उपस्थिति रही तथा ट्रेनिंग में 35 छात्र-छात्राओं ने सहभागिता की।आद्य रामानंदाचार्य का समरसता के प्रति साहसिक उद्घोष ही एकता का सूत्र- श्री भगवान वेदांताचार्य
दमोह। जगद्गुरु रामानंदाचार्य जी का एक अनोखा, राष्ट्रहितकारी समर्पण यह था कि उन्होंने भक्ति को केवल व्यक्तिगत मोक्ष तक सीमित न रखकर समाज-सुधार और सांस्कृतिक एकता का माध्यम बनाया। यह उद्गार काशी स्थित सभा के मध्य श्री भगवान वेदांताचार्य रसिक जी के मुखारविंद से आविर्भूत हुए जहां भारतीय चेतना के वह उज्ज्वल दीप कहलाए, जिसकी ज्योति केवल साधना-कक्ष तक सीमित न रहकर समूचे राष्ट्र-प्रांगण को आलोकित करती है। उन्होंने भक्ति को आत्मोद्धार का साधन मात्र नहीं रहने दिया, बल्कि उसे समाज-निर्माण और राष्ट्र-चेतना की सशक्त धारा में प्रवाहित किया। जिस युग में संस्कृत की गरिमा शास्त्रों तक सिमटी हुई थी, उस समय उन्होंने लोकभाषा को धर्म का वाहन बनाकर जन-जन के हृदय में रामतत्त्व की प्रतिष्ठा करते हुए यह भाषिक अर्थात भाषा से ऊपर साहसिक कदम जिसमें सभी भाषाएं सीमित न रही भारतीय सांस्कृतिक लोकतंत्र का प्रथम घोष किया। उनके लिए राम केवल आराध्य नहीं, बल्कि मर्यादा, न्याय और करुणा के सजीव आदर्श थे, ऐसे आदर्श जिन पर एक सुदृढ़ राष्ट्र की नींव रखी जाती है। रामानंदाचार्य जी की परंपरा में भक्ति ने समरसता का रूप धारण किया। जाति, कुल और सामाजिक भेद उनके लिए अर्थहीन थे। हरि को भजे जो हरि का होई कबीर, रैदास और पपिहा, धन्ना जैसे 12 शिष्यों के माध्यम से उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि आध्यात्मिक ऊँचाई जन्म से नहीं, चरित्र और चेतना से मापी जाती है। यह दृष्टि भारतीय समाज को जोड़ने वाली सेतु बनी। उनका वैराग्य लोकविमुख नहीं था; वह करुणा से ओतप्रोत लोकमंगल की साधना थी। तीर्थ, नगर और ग्राम उनके उपदेशों से अनुप्राणित हुए और उत्तर भारत की भूमि पर वैष्णव चेतना की ऐसी जड़ें पड़ीं, जिन्होंने संकट काल में भी भारतीय आत्मा को अक्षुण्ण रखा। प्रयाग राज में उनके जन्म के 726 वर्ष हुए है जहां काशी की पवन धरा उनकी कर्तव्य भूमि में आयोजित सभा में शामिल जगत गुरु रामकमलाचार्य, महंत श्रवण दास महंत मोहन दास महंत सिया राम दास सहित वैष्णव विरक्त संत समाज के प्रतिनिधित्व करते हुए श्री भगवान वेदांताचार्य रसिक जी का उद्बोधन करते हुए सम्मान किया यह एक दिवसीय और द्वय आध्यात्मिक नगरों में एक साथ प्रदीप्त होती हुई ऐतिहासिक उपलब्धि की झलक है जो बुंदेलखंड का स्वर्णिम इतिहास गढ़ रहा है।
दमोह। जगद्गुरु रामानंदाचार्य जी का एक अनोखा, राष्ट्रहितकारी समर्पण यह था कि उन्होंने भक्ति को केवल व्यक्तिगत मोक्ष तक सीमित न रखकर समाज-सुधार और सांस्कृतिक एकता का माध्यम बनाया। यह उद्गार काशी स्थित सभा के मध्य श्री भगवान वेदांताचार्य रसिक जी के मुखारविंद से आविर्भूत हुए जहां भारतीय चेतना के वह उज्ज्वल दीप कहलाए, जिसकी ज्योति केवल साधना-कक्ष तक सीमित न रहकर समूचे राष्ट्र-प्रांगण को आलोकित करती है। उन्होंने भक्ति को आत्मोद्धार का साधन मात्र नहीं रहने दिया, बल्कि उसे समाज-निर्माण और राष्ट्र-चेतना की सशक्त धारा में प्रवाहित किया। जिस युग में संस्कृत की गरिमा शास्त्रों तक सिमटी हुई थी, उस समय उन्होंने लोकभाषा को धर्म का वाहन बनाकर जन-जन के हृदय में रामतत्त्व की प्रतिष्ठा करते हुए यह भाषिक अर्थात भाषा से ऊपर साहसिक कदम जिसमें सभी भाषाएं सीमित न रही भारतीय सांस्कृतिक लोकतंत्र का प्रथम घोष किया। उनके लिए राम केवल आराध्य नहीं, बल्कि मर्यादा, न्याय और करुणा के सजीव आदर्श थे, ऐसे आदर्श जिन पर एक सुदृढ़ राष्ट्र की नींव रखी जाती है। रामानंदाचार्य जी की परंपरा में भक्ति ने समरसता का रूप धारण किया। जाति, कुल और सामाजिक भेद उनके लिए अर्थहीन थे। हरि को भजे जो हरि का होई कबीर, रैदास और पपिहा, धन्ना जैसे 12 शिष्यों के माध्यम से उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि आध्यात्मिक ऊँचाई जन्म से नहीं, चरित्र और चेतना से मापी जाती है। यह दृष्टि भारतीय समाज को जोड़ने वाली सेतु बनी। उनका वैराग्य लोकविमुख नहीं था; वह करुणा से ओतप्रोत लोकमंगल की साधना थी। तीर्थ, नगर और ग्राम उनके उपदेशों से अनुप्राणित हुए और उत्तर भारत की भूमि पर वैष्णव चेतना की ऐसी जड़ें पड़ीं, जिन्होंने संकट काल में भी भारतीय आत्मा को अक्षुण्ण रखा। प्रयाग राज में उनके जन्म के 726 वर्ष हुए है जहां काशी की पवन धरा उनकी कर्तव्य भूमि में आयोजित सभा में शामिल जगत गुरु रामकमलाचार्य, महंत श्रवण दास महंत मोहन दास महंत सिया राम दास सहित वैष्णव विरक्त संत समाज के प्रतिनिधित्व करते हुए श्री भगवान वेदांताचार्य रसिक जी का उद्बोधन करते हुए सम्मान किया यह एक दिवसीय और द्वय आध्यात्मिक नगरों में एक साथ प्रदीप्त होती हुई ऐतिहासिक उपलब्धि की झलक है जो बुंदेलखंड का स्वर्णिम इतिहास गढ़ रहा है।


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